स्वदेश प्रेम ब्यूरो/दिल्ली
दिल्ली की मुस्तफाबाद विधानसभा में कांग्रेस पार्टी की हालत दिन-ब-दिन कमजोर होती जा रही है। पार्टी ने इस बार अली मेहंदी को अपना प्रत्याशी बनाया है, जो पूर्व विधायक हसन अहमद के बेटे हैं। हालांकि, जनता और स्थानीय कार्यकर्ताओं के बीच उनकी पकड़ और स्वीकार्यता बेहद कमजोर नजर आ रही है। इससे साफ संकेत मिलता है कि इस बार मुस्तफाबाद में कांग्रेस का भविष्य अंधकारमय हो सकता है। अली मेहंदी का नाम भले ही राजनीतिक पृष्ठभूमि से जुड़ा हो, लेकिन उनका जनता के साथ जुड़ाव अब तक बेहद कमजोर रहा है। उनके पिता हसन अहमद कई बार विधायक रहे हैं, लेकिन उनका राजनीतिक प्रदर्शन और जनता की सेवा के प्रति रुख भी सवालों के घेरे में रहा है। यही कारण है कि कांग्रेस के इस “परिवारवादी दांव” को जनता से अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा।
हाल ही में मुस्तफाबाद में आयोजित कांग्रेस की सभा में सैकड़ों कुर्सियां खाली पड़ी थीं। यह नजारा कांग्रेस की गिरती साख और कमजोर संगठनात्मक ढांचे को उजागर करता है। स्थानीय कार्यकर्ताओं में जोश की कमी और नेतृत्व के प्रति उदासीनता ने कांग्रेस को कमजोर कर दिया है।
जबकि आप और भाजपा जैसे प्रतिद्वंद्वी दल जमीनी स्तर पर सक्रिय हैं और जनता के मुद्दों को उठा रहे हैं, कांग्रेस अपने पुराने तरीकों से बाहर नहीं निकल पा रही है। अली मेहंदी जैसे उम्मीदवार को आगे बढ़ाना, जो जनता से कटा हुआ है, पार्टी के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है।
जनता का मानना है कि कांग्रेस ने इस बार भी उम्मीदवार के चयन में गंभीरता नहीं दिखाई है। अली मेहंदी को लेकर क्षेत्र में यह धारणा बन रही है कि वे केवल अपने पिता की राजनीतिक विरासत पर निर्भर हैं और स्थानीय मुद्दों को लेकर उनके पास कोई ठोस एजेंडा नहीं है।
मुस्तफाबाद में कांग्रेस की हालत इस बार बेहद खराब नजर आ रही है। अली मेहंदी को लेकर पार्टी का दांव उलटा पड़ता दिख रहा है। क्षेत्र में जनता का रुझान जिस तरह से कांग्रेस से हटता जा रहा है, उसे देखते हुए यह कहना गलत नहीं होगा कि इस बार मुस्तफाबाद में कांग्रेस का “बंटाधार” तय है।
